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Rajpurohit Yuva Sangh - Rangeelo Rajasthan - Kheteshwar Vandana

Rangeelo Rajasthan

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Rajpurohit Yuva Sangh - Members

Wednesday, April 9, 2008

Rajpurohit Yuva Sangh, Chennai - Rangeelo Rajasthan

Jai Sri Raghunath ji ri Saa...
Rajpurohit Yuva Sangh, Chennai organized a mega cultural fest "Rangeelo Rajasthan" as part of Holi Celebrations on 23.03.08.
The program started at around 6.00 PM in a Jam-Packed Raja Annamalai Hall with capacity of 1000 people. The first one hour was a Haasya Kavi Sammelan wherein popular Kavis from across India were invited to entertain the audience.
The next program was the much awaited Cultural Dance Extravaganza which was performed by a team of 30, exclusively called for this event from Rajasthan.
The Videos of this event are being uploaded in this blog. Don't forget to view them.

Surender Singh, Jasnagar
Member - Rajpurohit Yuva Sangh

Video of the Members after the completion of Rangeelo Rajasthan
video

Thursday, December 27, 2007

About Rajpurohit

~~~ About Rajpurohit ~~~





Rajpurohit is basically a Hindu caste with it's roots in hrishikul (great revered Indian sages from Vedic era), belongs to India. There are more than 100 sub-castes of Rajpurohit, known as Gotra, e.g. Sevad, Jagarwal, Manana, Rajguru, Mutha, Gundecha, Audichya(also known as Udesh, Trambkoti) etc. Rajpurohits are pure vegetarian, believes in Hindu Vedic Sanskriti.

~~~ Demography ~~~




Rajpurohit is basically a Title bestowed upon those Brahmins, who used to perform the rituals and rites for the Raja of some Kingdom. In the course of their service to the Kingdom, according to ancient traditions, the king used to donate few villages within his kingdom to their Rajpurohit. These villages were considered to be free from any ruler, and were outisde the ambit of any form of tax. Also any Kshatriya clan were barred to live in such villages. Even today, this is a fact in many parts of Rajasthan. Since in India, majority of Rathodi raj was prevelant in Rajasthan, the Rajpurohit caste is prominently found in Rajasthan. Most of the Rajpurohits who live in other parts of India, can trace back their roots, upto one to two generations, back in some village of Rajasthan. However some parts of Gujarat and Madhya Pradesh with their common boundry with Rajasthan do have Rajpurohit caste for quite some time.

Brahmavatar Sant Shri 1008 Khetaramji Maharaj

Brahmavatar Sant Shri 1008 Khetaramji Maharaj "Sun of Rajpurohit Samaj"

Birth Date : April 22, 1912 ( Vikram Samavat 1969 Vaishakh Sudi Pancham, Monday)
Father : Shri. Shersingh Ji Rajpurohit (Udesh)
Mother : Shrimati. Sanagari Devi
Birth Place : Khed Village
Tehsil : Sanchour, District - Jalore (State)
Birth Name : Khetaram
Vairagya : At age of 12 Years.
Guru : Shri Ganeshanandan Ji Maharaj
Specialty : Towards Jeeva Daya (Protection of Lives)
To be together on one stage in Rajpurohit Samaj, become introduced to International Level
Vachan Siddha Mahapurush in Kalayug,
Many Magics Showing, Ghor Tapaswi, Bramhavatar.

Established : Bramhaji Temple at Aasotara.

May 20, 1961 - Bhoomi Pujan Neev of Main Door ( Vikram Samavat 2018 Vaishakh Sudi Pancham Saturday)
April 28, 1965 - Bhoomi Pujan Neev of Bramhaji's Temple ( Vikram Samavat 2020 Vaishakh Sudi Pancham)
May 6, 1984 - Pran Pratishtha Mahotsav of Temple (Vikram Samavat 2041 Vaishakh Sudi Pancham Sunday)
May 7, 1984 - Bramhalin on Monday Afternoon 12:36 Bramhadham Asotara ( Vikram Samavat 2041 Vaishakh Sudi 6 )


श्री खेतेश्वर भगवान का संक्षिप

श्री खेतेश्वर भगवान का संक्षिप परिचय महर्षि उलक के गौत्र प्रवर्तक-''उदेश'' कुल में आवरण भारतीय इतियास में ऐसे अगिणत जीवन भरे पडे हैं। जिनके सम्मुख आदि शक्ति ने अपनी सम्पूर्ण शक्ति से भरपूर दिव्य तथा तेजस्वी आत्माओं का आवतर्ण आद्यात्मिक पवित्र भूमि गौरव से अभिमण्डित रत्न गर्भा भारत भूमि आदि अलंकारों से जिडत व पवित्र भूमि पर होता रहा हैं। परमेश्वर की चमत्कारिक दैविक शक्ति तथा पवित्र तेजस्वी आत्माओं का आवरण होने का श्रेय भारत भूमि को अनेको बार मिलता रहा हैं। संदर्भ में यहा की संस्कृति आज भी पुकार रही हैं। इतना ही नही समय-समय पर हमारे समाज को सुसंस्कृति, पवित्र और प्रेममय बनाने की अद्भुत क्षमता तथा सामर्थ रखने वाली आदि-शक्ति के प्रकाश-पुंज प्रतिनिधयों के रुप में आवतरित हुए हैं।
समाज में जिन्हौने निराशमय जीवन को आशामय बनाया, नास्तिक व्यक्तियों में पवित्र आस्तिकता का ज्ञान कराया, अन्धकारमय जीवन में ज्योति जगाकर प्रकाशित किया । पावन धरती दिव्य आत्माओं से कभी रिक्त नही रही। इन्हीं पवित्र आत्माओं में से एक थे युग प्रेरक श्री खेतेश्वर भगवान जिनकी अद्भभुत चमत्कारी दैविकशक्ति, सामाजिक चैतन्य शक्ति, ब्रह्म की साकार शक्ति, ब्रह्म आनन्द का साकार दर्शन जीवन दान की अद्भुत जीवन संजीवनी शक्ति आदि असीम शक्तियों को संजोग स्वरुप राजपुरोहित समाज में गौतम वंशीय महर्षि उलक की गौत्र प्रवर्तक वंशावली के 'उदेश' कुल में अवतरण हुआ। श्री खेतेश्वर जाति धर्म से श्वपर उठकर प्रत्येक वर्ग में स्नेह के पुजारी रहे। संदर्भ में आज भी उनके प्रति सभी संप्रदायो के संतो, महन्तो व जन साधारण आदि की अटूट आस्था देखने को मिलती है। दिनों के प्रति अति व्याकुलता एंव जन साधारण के प्रति उनके जीवन का मुख्य गुण सामने आता हैं।

राजस्थान में बाडमेर जिले के शहर बालोतरा से लगभग दस किलोमीटर दूर गढ सिवाडा रोड पर दिनांक 5 मई, 1961 को गांव आसोतरा के पास वर्तमान ब्रह्म धाम असोतरा के ब्रह्म मन्दिर की नीव दिन को ठीक 12बजे अपने कर कमलो से रखी। जिसका शुभ मुहूत स्वंम आधारित था। ब्रह्म की प्रतिमा के स्नान का पवित्र जल भूमि के श्वपर नही बिखरे जिसके संदर्भ में उन्होने प्रतिमा से पाताल तक जल विर्सजन के लिए स्वंयं की तक्निक से लम्बी पाईप लाईन लगावाई। 23 वर्ष तक चले निर्वहन इस मन्दिर निमार्ण में राजस्थान की सूर्य नगरी जोधपुर के छीतर पत्थर को तलाश कर स्वंयं के कठोर परिश्रम से बिना किसी नक्शा तथा नक्शानवेश के 44 खम्भों पर आधारित दो विशाल गुम्बजों के पिश्चम में एक विशालकाय शिखर गुम्बज तथा उत्तर-दक्षिण में पांच-पांच, कुल दस छोटी गुम्बज नुमा शिखाएं, हाथ की सुन्दर कारीगरी की अनेक कला कृतियां जिनकी तलाश की सफाई व अनोखे आकारो में मंडित प्रतिमायें से जुडा पवित्र व शान्त वातावरण इस विशाल काय ब्रह्म मन्दिर के एक दृढ संकंल्पी चिरतामृत का समर्पण दर्शनार्थी को आकिर्षत किए बिना नही रहता। ब्रम्हाधाम आसोतरा के ब्रह्म मन्दिर का निर्माण कार्य पूर्णकर श्री खेतेश्वर ने दिनांक 5 मई, 1984 को सृष्टि रचता जगत पिता भगवान ब्रम्हाजी की भव्य मूर्ती को अपने कर कमलो से विधि वत प्रतिष्ठत किया। प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के दिन महाशान्ति यज्ञादि कार्यक्रम करवाये गये। इसी पुनीत अवसर पर लगभग ढाई हजार से भी ज्यादा संत महात्माओं ने भाग लिया। तथा लगभग ढाई लाख से भी ज्यादा श्रद्वालु भक्तजनों ने इस विराट पर्व का दर्शन लाभ उठाकर भोजन प्रसाद ग्रहण किया भोजन प्रसाद कार्यक्रम तो उस दिन से नि:शुल्क चालु हैं। जिस दिन उक्त मन्दिर की नीव का पहला पत्थर धरती की गोद में समिर्पत हुआ। वही पत्थर वर्तमान में आज दिन तक तकरीबन तीस वर्षो से लाखों श्रद्वालु भक्तो को नि:शुल्क भोजन प्रसाद दे चुका है। तथा भविष्य में भी देता रहेगा। ऐसे विग्न की घोषणा का स्वरुप युग प्रेरक श्री खेतेश्वर भगवान ने ही बनाया था। जो आज भी पूर्ण रुप से चल रहा हैं। आम बस्ती से मीलों दुर जंगल की सन-सत्राजी हवाओं तथा मखमली रेत के गुलाबी टीबों के बीच प्रतिष्ठा दिवस की वह मनमोहनी रात्री का समय क्रित्रम बिजली की जग मगाहट को फूदक-फूदक कर नृत्य करती रोशनी से ऐसे सलग रही थी जैसे धरती पर देव राज्य स्वर्ग उतर आया हों। प्रात:काल की सुन्दरीयां भोंर में पक्षियों की चहचहाट की मधुर वाद्य वेला दर्शनार्थीं श्रद्वालुओं के हदय कमलों को मन्त्र मुग्ध सा कर देती हैं। श्री खेतेश्वर ने प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव के दूसरे दिन 6 मई, 1984 को लाखों दर्शनार्थियों के बीच मूर्ति प्रतिष्ठा के 24 घन्टे पशचात दिन को ठीक 12बजे साधारण जन के लिए एक प्रकार से वज्रपात सा लगा।
अब श्री खेतेश्वर सृष्टि कर्ता ब्रम्हाजी के सम्मुख जगत कल्याण की मंगल कामना करते हुए अपना अवलोकिक नश्वर शरीर त्याग कर ब्र्ह्मलीन हो गए। आदि शिक्त के विधान की विडम्बना इस विलक्षण्यी दृश्य से वहा उपस्थित श्रद्वालु भाव विभोर होकर श्री खेतेश्वर भगवान की जय जयकार के उद्घोषों से आकाशीय वातावरण को गूंजायमान करने लगे। तत्पशचात उनका पवित्र नाश्वान शरीर सनातन धर्म की हिन्दु संस्क्रति के अनुसार तीर तलवार, भालो, ढालो, की सुरक्षा तथा साष्टांग प्रमाण नौपत व नंगारों व मृदंगन के साथ मोक्ष प्रिप्त राम नाम धून से सारा वातावरण एक मसिणए वैराग्य का स्वरुप धारण करके अग्नि को समर्पित किया गया। चन्दन, काष्ठ, श्रीफल, नरियल, तथा घृत आदि की अन्तिम संस्कारिक आहुतिया के मंन्त्रों से वैराग्य वातावरण ने तत्वों से जुड़ित देहिक पुतले को अग्नि में, जल में, वायु में, आकाश में व पृथ्वी में पृथक-पृथक विलय का वोध कराया। जो एक ईश्वरीय शक्ति स्वरुप पवित्र आत्मा विश्व शान्ति की साधना में अमृत को प्राप्त हुई। ऐसी महान आत्मा को सत् सत् वन्दन! प्रित वर्ष युग प्रेरक श्री खेतेश्वर भगवान की पुण्य तिथी ब्रहाधाम आसोतरा में विशाल समारोह पूर्वक मनाई जाती हैं। वैशाख शुक्ला छठवी को ब्रम्ह धाम पर हर जाति, सम्प्रदाय तथा वर्ग के लोग हजारो की संख्या में आकर उनकी बैकुठ धाम समाधि पर पुंष्पांजंली अर्पित करते हैं। श्रद्वालु ऐसा करके अपने को धन्य सा समझते हैं। दो तीन दिन का यह 'आध्यात्मिक मेला' प्रत्येक जाति तथा वर्ग को अनादिकाल की संस्क्रति की प्रतिमाओ को बटोरे वर्तमान युग निर्माण की प्रेरणाओं से ओत-प्रोत दर्शन कराता है।
इस सम्पुर्ण कार्यक्रम का संचालन भारतीय संस्क्रति की एतिहासिक जाति का वर्ग श्री राजपुरोहित समाज एक 'न्यास' रुपी संस्था द्वारा कराता है। राजपुरोहित समाज के भारतिय संस्क्रति के अन्तर्गत महत्पूर्ण योगदान के प्रित जगत स्वामी विवेकानन्दजी ने लिखा है-भारत के पुरोहितों को महान बोद्विक और मानसिक शक्ति प्राप्त थी। भारत वर्ष की आद्यत्मिक उन्न्ति का प्रारम्भ करने वाले वे ही थे और उन्हौने आश्चर्यजनक कार्य भी संपन किया। वर्तमान में इस आश्चर्य जनक दर्शन का जीता जागता दर्शन ब्रह्म धाम आसोतरा हैं। जहॉं ब्रह्म सावित्री को संग-संग विराजमान करके ब्रम्हाजी के परिवार की प्रतिमाए प्रतिष्ठ की गयी। जिनके आपस के श्रापो का विधान तोडकर फिर से नए प्रेरणा का मार्ग दर्शन कराया । जिनको वर्तमान में हम कोटि-कोटि शत वन्दन् करते।

Tuesday, December 25, 2007

"Sant Shri Tulacharam Ji Maharaj"


"Sant Shri Tulacharam Ji Maharaj"


Birth Date : September 3, 1952 (Vikram Samavat 2009 Bhadrapada Suklapaksa Chaturdashi - Wednesday)

Father : Shri Pratapsingh Ji Rajpurohit (Panchalod)

Mother : Shrimati Lahari Devi

Birth Place : Indrana Village,

Tehsil : Sivana, Badmer (Rajasthan State)

Vairagya : Since Childhood

Guru : Bramhalin Sant Shri 1008 Shri Khetaram Ji Maharaj

Chadar Festival : By Sant Shiromani Shri Atmanand Ji Maharaj, by the consent of Rajpurohit Samaj as


Gadipati of Brahmavatar Sant Shri 1008 Khetaram Ji Maharaj.

Specialty : Ghor Tapaswi

Gadipadi - Bramhadham Asotara - Samadhi of Sant Shri Khetaram Ji Maharaj (Vaikuntha Dham)

Developed the First Statue and laid foundation of Kheteshwar Vidyapith with all Vidhi's.

celebrating Sant Shri 1008 Kheteshwarji anniversary

Awarded Leading students of Rajpurohit Samaj.


Handling of Many Goushala.


Every year provision of "Netra Chikitsa Shivir" (Eye Camps)

May 18, 2002 : Passed an order for Development of Rajpurohit Samaj and community and also made it compulsory to follow for entire community for upliftment and betterment of the society.

"Shikshavidam Sant Shri Aatmanand Ji Maharaj"

"Shikshavidam Sant Shri Aatmanand Ji Maharaj"



Birth Date : September 3, 1924 ( Vikram Samavat 1981 Bhadrapada Suklapaksa Chaturthi - Wednesday )

Father : Shri. Devisingh Ji Rajpurohit (Gundesha)

Mother : Shrimati. Mangu Devi

Birth Place : Barava Village

Tehsil : Bali, District - Pali (Rajasthan)

Birth Name : Achalsingh

Guru : Jagadguru Shankaracharya Anant Shri Shantanand Saraswatiji Maharaj of Jyotipith

Specialty : Mahan Karmayogi, Son of Saraswati who raised the importance of education in Rajpurohit Samaj

Samarthak of all living things also a head saint in Protection of Cows.

"Adhyatmik Mahapurush", Ghor Tapswi , lovely speaker, built Hostels for the development of the field of Education


Rajpurohit Hostels :

Jalore, Pali (Marwad), Falna, Raniwada, Kalandri, Jodhpur (Tisara Vistar), Sirohi, Bhinmal and Ahore.

Rajpurohit Samaj Bhawans:

Samaj Bhavan - Sanchour, Sirohi, Kalandri, Pali, Nimbeshwar Mahadev etc.

On the name of Sant Shri, Hostels of Samaj are developing in prominent places.

Development of many Goushala.

Monday, December 24, 2007

Greatness of Gurú and Gurú Poornima

GURUR BRAHMÁ, GURUR VIŠNÚGURUR DÉVÓ MAHÉŠVARA
GURUR SAKŠÁT PARABRAHMaTASMAI ŠRÍ GURAVÉ NAMAH

In our land the teacher who imparts training is held in very high esteem. The teacher is respected like a father. As the above saying describes, the teacher is considered as the 'trimurtis'- Brahma, Vishnu and Shiva - all rolled into one.

Gurú is Brahma; Gurú is Vishnu; Gurú is Shiva; Gurú is Brahman, the Absolute Flesh; Reverenciado is Their Name.

The Festival of Gurú Poornima (the Full Moon of the Gurú ) is one of the most important celebrations of the Hindu Culture. It is the day in which one surrenders cultured special to the Acharya (Masterful; "those that practice what they preach"), that through their Infinite Compassion and the Supreme Grace has distributed the Knowledge of the Absolute one (Brahma Vidya) to all finder of if same, like way to obtain the union with God.

This day of Poornima (Full Moon) in the month of Ashadha (Julio-Agosto) is considered Sacred.
In order to include/understand the importance of this day truely favorable, is due first to understand the meaning of "Guru '" (Masterful Spiritual). The syllable "Gu" means: "the dark"; and "ru": "one that it dissipates, that destroys". Soon the Gurú word means: "One that dissipates or destroys the dark".

Gurú (Masterful Spiritual) is That one that dissipates or destroys the dark of the ignorance blessing to its disciples (Bhakta) with the true knowledge, the Knowledge of God.

The Sagradas Hindu Scriptures agrees in the indispensable thing of Spiritual Gui'a, since the being (jiva) cannot obtain the elucidation by itself, without the guide of a Gurú.

Express God in the Scriptures that nobody can obtain it to HIM without surrendering first a a Gurú, declaring that IT does not give to his knowledge and love directly, but that does through a Gurú.

The human being is very difficult, still journeying the footpath of the spiritual way, to love the abstract thing. Therefore the Scriptures advise to venerate to which they take it until God; loving its physical presence as Divine manifestation of HIM in human form. Thus, when God assumes a human form, IT settles down itself like the Gurú. The Gurú is showed God, becoming in the Light, Inspiration and Example of its disciples. The Gurú and God are One, because the Omnipotente and Its Means of Manifestation cannot be different. The Gurú incarnates the aspects Nirguna (God without attributes) and Saguna (God with attributes) of the Supreme Being (guna: qualities of the nature). Two are the conditions that must fulfill a Guru ': 1° To be expert in all Scriptures. 2. To have obtained the union with God. The first condition only can be reunited by which it has fulfilled the second condition, since to which it has obtained the accomplishment in God grants the perfect knowledge automatically to him. This way the words of the Gurú distribute knowledge (Jñana) and dissipate the ignorance causing the gradual separation of the material world and the permanent union with God; by means of waking up of the conscience, the transformation and elevation same beyond the physicist of the spiritual finder; whose exclusive work is to include/understand its true identity with God.

The Bhagavadgita also sets the standards about that are a genuine Gurú, saying that he is That one that distributes true free knowledge of speculation and it never alleges that It is God. He knows that God is Supreme and the men are subordinated HIM He knows the Truth and lives in her, is free of greed, lujuria and rage. It is example of love, wisdom, peace, automatic control, austerity, mercy, tolerance and fort faith in God. He must come through one long and continuous succession of Acharya (Guru Parampara).
At the moment of initiation (Deeksha), the Gurú absorbs the sins last and karmas of its disciples and reveals the true spiritual knowledge to them. The disciple develops strong love by the Gurú that releases of the slavery of birth and death to it.

There are eight types of Guru ':

1: Bodha Guru ': the Shastra teaches and encourages to the student to act in agreement with its orders.

2: Guru Prohibition ': it distributes the internal meaning of the Prohibition, establishes to the disciple in the spiritual truths and it guides his mind towards God.

3: Nishidha Gurú:`imparte the knowledge of the rituals and duties and teaches how it is possible to be assured
well-being now and for always.

4: Kamya Guru ': it guides the student so that it carries out commendable acts that assure the happiness to him in both worlds.

5: Vachaka Gurú distributes the knowledge of yoga and prepares to the disciple for the spiritual life.

6: Suchaka Guru ': it teaches how the senses by means of different types from disciplines are controlled.

7: Karana Guru ': it reveals the unit of the Jivi (individual) with the Atma.

8: Vihita Guru ': it clarifies all the doubts, it purifies the mind and it shows how the autorrealización can be obtained.

Most important it is the Karana Gurú, that through many lessons and practices helps the individual to progress of the human conscience to the Divine Conscience. Single the Divinity can act so like a teacher. Only through the purification of the mind the Supreme Being can be made.

In India he considers himself to the Moon (Chandra) as Deity runs of the mind and to the Sun of the intellect.
In the Hindu Calendar four days of Full Moon exist that are more sacred than the others; the Full Moon
that one appears in the months of Vaisaka, Ashada, Sravana and Magha.

When the moon is full (poornima) is illuminated by the rays that receive from the sun; the mind is, that night, in a while propitious to obtain by means of the culture of the internal vision through the light of the Love, the Wisdom and Spiritual Illumination.

In this day of celebration the disciples make orations or plegarias of offering (Pooja) to the Gurú, praying with the following Plegaria : "Oh Gurú, You are Father, Mother, Brother, Friend, Knowledge and Prosperity. You are for me Everything and God of all the Gods ".


This day of gratefulness extends to all the Gurú, but in special to the Fundamental Gurú , first of the Acharya: Sri Vyasa Prohibition , Vyasa Maharishi (Great Rishi) to that they are offered special bids up pooja/offerings). Sri Vyasa revealed that the principle of Brahma interpenetrates and maintains reunited to the multiplicity within the One Sri Vyasa was the highest authority than analyzed and classified the Prohibition (Sagradas Scriptures), for whose interpretation the Brahmasutra wrote, which were explained as well through the writing of the eighteen Puranas. At the end of all this, Sri Vyasa wrote the Harivamsha, the History of Mr. Krishna. The History of the Mahabharata had been written by him just a short time before, being the ocean of deep knowledge, to that also the flame the Fifth Prohibition. The Bhagavadgita, which is honest anywhere in the world as book of wisdom and jewel of rectitud (Dharma), comprises of the Mahabarata. This way It left a rich legacy of nonsingle sapiencia to his country but to the entire world.

It is known that Sri Vyasa, this considered Hindu wise person like the descended same Gentleman like man, was born a day of Full Moon, finished codifying the Sacred texts a day of Full Moon and also completed the writing of the Purana in day of Full Moon. It is in its honor and so that the humanity can offer the gratitude to him that is deserved, that restored during this day of Full Moon the day of the Gurú.

Its vast work was to codify the Prohibition (El Saber) in four parts (1131 Sakhas <> ):

Rig Prohibition (21 Sakhas) corresponds to Sacred Hymns to the Gods,
Yajur Prohibition (101 Sakhas) corresponds to Sacred Rituals (movements) to the Gods,
Sama Prohibition (1000 Shakas) corresponds to Melodías Sagradas to the Gods,
Atharva Prohibition (9 Shakas) corresponds to Ma'gico-Sagrados Spells to the Gods.

Also Sutras or Aforismos wrote the Brahma Sutra (555 that integrates the messages of the Upanishad (analysis of the Prohibition of philosophical character) which they relate to Jiva (the being), Universo and Brahman (God).


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